25 साल तक अदाणी पावर से बिजली खरीद: सरकार बताए उत्तराखंड की कुल वित्तीय देनदारी कितनी होगी?
धामी सरकार के अनुसार UPCL को अदाणी पावर लिमिटेड से 25 वर्षों तक बिजली खरीदने की अनुमति दी गई है। अगस्त 2026 में घोषित टैरिफ ₹5.746 प्रति यूनिट है। यह प्रक्रिया Tariff Based Competitive Bidding के माध्यम से हुई और सरकार के अनुसार अदाणी पावर L1 रही। बिजली छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित संयंत्र से वित्तीय वर्ष 2029-30 से मिलने की बात कही गई है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार के प्रमुख सचिव ऊर्जा ने 17 सितंबर 2026 को स्पष्ट किया है कि 25 वर्षों में संभावित कुल भुगतान लगभग ₹1.60 लाख करोड़ से ₹1.66 लाख करोड़ हो सकता है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह एकमुश्त भुगतान नहीं, बल्कि 25 वर्षों में वास्तविक बिजली आपूर्ति और अनुबंध की शर्तों के अनुसार संभावित कुल भुगतान है।
लेकिन हमारे सवाल-
क्या उत्तराखंड सार्वजनिक ऊर्जा क्षेत्र को मजबूत कर रहा है या निजी खरीद पर निर्भरता बढ़ा रहा है?
उत्तराखंड में UJVNL, UPCL और PTCUL जैसी सार्वजनिक ऊर्जा संस्थाएं वर्षों से काम कर रही हैं। राज्य के पास विशाल जलविद्युत क्षमता है और THDC की टिहरी, कोटेश्वर, विष्णुगाड-पीपलकोटी तथा Pumped Storage जैसी परियोजनाएं इसका उदाहरण हैं।
यह बात सही है कि उत्तराखंड की जलविद्युत पर निर्भरता के कारण मौसम और जलप्रवाह में बदलाव से उत्पादन प्रभावित हो सकता है तथा भविष्य में बेस-लोड बिजली की आवश्यकता हो सकती है।
लेकिन प्रश्न यह है कि इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों की अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने के विकल्प का कितना गंभीरता से मूल्यांकन किया गया?
2024 में UJVNL–THDC मॉडल पर विचार हुआ था
सरकार के ताजा स्पष्टीकरण के अनुसार 1320 MW की आवश्यकता को पूरा करने के लिए UJVNL और THDC के संयुक्त उपक्रम का विकल्प भी विचाराधीन था। सरकार का कहना है कि THDC, NTPC की सहायक कंपनी होने के कारण NTPC की नीतियों के अधीन है और थर्मल पावर में विस्तार के लिए आवश्यक अनुमति नहीं मिल सकी। इसलिए वह Joint Venture आगे नहीं बढ़ पाया और बाद में प्रतिस्पर्धी निविदा के माध्यम से बिजली खरीद का रास्ता अपनाया गया।
1- UKD सरकार के इस स्पष्टीकरण को संज्ञान में लेते हुए पूछता है—
क्या UJVNL को किसी अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के साथ मिलकर परियोजना विकसित करने का विकल्प तलाशा गया?
2- क्या राज्य सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र में स्वयं थर्मल अथवा अन्य बेस-लोड क्षमता विकसित करने की आर्थिक व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार की?
यदि ऐसी रिपोर्ट तैयार की गई है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
3- सरकार द्वारा घोषित टैरिफ ₹5.746 प्रति यूनिट है। लेकिन किसी बिजली खरीद समझौते की वास्तविक आर्थिक लागत समझने के लिए केवल घोषित टैरिफ पर्याप्त नहीं होता।
सरकार ने स्वयं स्पष्ट किया है कि ट्रांसमिशन व्यवस्था और उससे संबंधित लागत निविदा एवं टैरिफ की शर्तों के अनुसार निर्धारित होगी। इसलिए जनता के सामने यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि उत्तराखंड की सीमा तक बिजली पहुंचने की वास्तविक लागत क्या होगी और कुल landed cost कितनी होगी।
सरकार से मांग करते है कि निम्न जानकारी सार्वजनिक की जाए—
₹5.746 प्रति यूनिट टैरिफ का पूरा breakup।
Fixed Charge और Fuel/Variable Charge का अनुपात।
Transmission Charges।
Transmission losses।
अन्य वैधानिक शुल्क एवं कर।
25 वर्षों में UPCL की संभावित कुल देनदारी।
वास्तविक बिजली आपूर्ति के आधार पर संभावित कुल भुगतान।
Fixed Charge को 70 से 75 प्रतिशत करने पर भी सवाल
सरकार के प्रमुख सचिव ऊर्जा ने बताया है कि निविदा प्रक्रिया में Model Bidding Document की 70 प्रतिशत Fixed Charge सीमा को बढ़ाकर 75 प्रतिशत करने का प्रस्ताव रखा गया था और UERC ने इसे मंजूरी दी। सरकार का कहना है कि इससे अपने आप उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त भार सिद्ध नहीं होता, क्योंकि अंतिम भुगतान कुल टैरिफ पर निर्भर करेगा।
इस बदलाव का राज्य के दीर्घकालीन वित्तीय जोखिम पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
इसका पूरा तकनीकी और आर्थिक मूल्यांकन जनता के सामने रखा जाना चाहिए।
सरकार के अनुसार छत्तीसगढ़ में उत्तराखंड को आवंटित कोयला ब्लॉक से जुड़े संसाधनों का उपयोग किया जाएगा और वहीं 1320 MW का संयंत्र स्थापित किया जाना है।
सरकार का तर्क है कि उत्तराखंड पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील राज्य है और थर्मल प्लांट को देश में किसी उपयुक्त स्थान पर लगाने का विकल्प रखने से ईंधन और परिवहन लागत को ध्यान में रखकर प्रतिस्पर्धी दर प्राप्त की जा सकती है। सरकार ने यह भी कहा है कि उत्तराखंड में प्लांट लगाने पर कोई रोक नहीं थी
मुख्य प्रश्न है कि—
क्या छत्तीसगढ़ में उत्पादन और उत्तराखंड तक बिजली पहुंचाने के पूरे मॉडल की तुलना उत्तराखंड में उत्पादन करने के विकल्प से की गई?
यदि तुलना की गई है तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
मुद्दा अदाणी बनाम कोई और कंपनी नहीं—मुद्दा उत्तराखंड की ऊर्जा नीति है
UKD स्पष्ट करना चाहता है कि यह प्रश्न किसी एक निजी कंपनी तक सीमित नहीं है।
निजी क्षेत्र की भागीदारी हो सकती है और प्रतिस्पर्धी बोली भी हो सकती है। लेकिन उत्तराखंड जैसे ऊर्जा उत्पादक राज्य के लिए यह जरूरी है कि उसके सार्वजनिक ऊर्जा उपक्रम कमजोर न पड़ें और राज्य की अपनी उत्पादन क्षमता लगातार बढ़ती रहे।
यदि अगले 25 वर्षों में राज्य की बिजली जरूरतों का बड़ा हिस्सा दीर्घकालीन निजी Power Purchase Agreements से पूरा किया जाता है, तो सरकार को यह भी बताना चाहिए कि UJVNL, UPCL और PTCUL की भूमिका आने वाले वर्षों में क्या होगी।
UKD की 8 प्रमुख मांगें
1. 1320 MW का पूरा Power Supply Agreement सार्वजनिक किया जाए।
2. ₹5.746 प्रति यूनिट के साथ वास्तविक landed cost का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए।
3. 25 वर्षों में अनुमानित ₹1.60–1.66 लाख करोड़ के संभावित भुगतान का विस्तृत वित्तीय आकलन सार्वजनिक किया जाए।
4. 2024 के UJVNL–THDC विकल्प और वर्तमान निजी बिजली खरीद मॉडल का स्वतंत्र आर्थिक तुलनात्मक अध्ययन कराया जाए।
5. Fixed Charge को 70 से 75 प्रतिशत करने के औचित्य और उसके वित्तीय प्रभाव की पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए।
6. छत्तीसगढ़ के कोयला ब्लॉक, Mining/MDO व्यवस्था, कोयले की लागत और बिजली उत्पादन की लागत का पूरा विवरण विधानसभा के समक्ष रखा जाए।
7. UJVNL, UPCL और PTCUL की आगामी 25 वर्षों की उत्पादन एवं वित्तीय क्षमता बढ़ाने की योजना जारी की जाए।
8. उत्तराखंड के लिए दीर्घकालीन Public Energy Policy बनाई जाए, जिसमें Hydro, Pumped Storage, Solar, Thermal और अन्य स्रोतों का संतुलित मिश्रण हो।
उत्तराखंड की नदियां, जलस्रोत, खनिज और ऊर्जा संसाधन आने वाली पीढ़ियों की अमानत हैं।
इसलिए सरकार को ऐसे हर दीर्घकालीन ऊर्जा समझौते में पारदर्शिता, आर्थिक जवाबदेही और सार्वजनिक हित सुनिश्चित करना चाहिए।
1320 मेगावाट बिजली का प्रश्न केवल आज की बिजली जरूरत का प्रश्न नहीं है। यह अगले 25 वर्षों में उत्तराखंड की ऊर्जा व्यवस्था की दिशा तय करने वाला निर्णय है।
सरकार जवाब दे—उत्तराखंड अपनी ऊर्जा क्षमता का निर्माता बनेगा या आने वाले वर्षों में मुख्यतः बिजली का खरीदार?